Monday, February 13, 2017

Happy V Day


वेलेंटाइन  के पंछी  ----

मेरे प्यारे दोस्तों आपका स्वागत करता हूँ ,और माफ़ी भी चाहता हूँ की आपसे रूबरू होने में काफी वक़्त लगाया।। आओ चलें फिर से गुफ्तगू करें कुछ अपनी कहें कुछ आपकी सुने। ..

  14th -फरवरी हे और आज के दिन को वैलेंटाइन के रूप में मनाया जाता हैं जैसा हम सबने पढ़ा और लोगो को मनाते  भी देखा हैं और सुना हैं ,
मुझे  धुंधला सा याद आता हैं की जब मैं  एमएससी  फाइनल ईयर में था तो किसी ने मुझसे पूछा था की यार तुझे पता हैं की वैलेंटाइन क्या होता हैं ,,शक मत कीजिये वो मेरा क्लासमेट मुकेश था।  सच में ऐसा लगा जैसे किसी हिंदी के प्रोफेसर को बेंजीन या अल्कोहल का फार्मूला पूछ लिया हो।  मेने एक अदब से होशियार की तरफ मुकेश को जवाब दिया हाँ पता हैं कल बताऊंगा अभी लैब में जाना हैं कहकर वहां से कल्टी मर ली ,,पीछे से आवाज आयी में भी तो आ रहा हु लैब में वहीँ बता देना। अब क्या करूँ बताऊ उसे की में खुद नहीं जानता हूँ न ही कभी सुना पढ़ा हैं
हकीकत तो यह थी की मेने सोचा था की केमिस्ट्री का कुछ रिएक्शन होगा ,और मुझे नहीं आये ये तो तोहीन  जैसा लग रहा था ,एक तो में टोपर और दूसरा कॉलेज का प्रेजिडेंट। इज्जत का सवाल था जनाब। एक प्यारे से शरीफ पढ़ाकू बच्चे जैसे पहुँच गया केमिस्ट्री की प्रोफेसर के चैम्बर के सामने  may  I  come  in  madam ..हाँ आओ कहो प्रमोद -मैडम आपसे कुछ पूछना था  सवाल था। लंबी सांसे भर कर जाना पड़ता था जब भी प्रोफेसर्स से मिलने जाओ  वो जमाना भी अजीब था। . पूरी तरह से कॉन्फिडेंट पूछ लिया मैडम से -ये वैलेंटाइन रिएक्शन आर्गेनिक में हे मैडम या इनऑर्गेनिक में। मुझे रिपीट करने को कहा, की मैं  क्या पूछना चाह  रहा था।  थोड़ा जोर लगाके पूछा ताकि मैडम प्रॉपर सुन सके।
कुर्सी ले लो बेटा  बैठ जाओ पानी पीओगे  मेने गर्दन हिला कर नहीं का संकेत दिया। मैडम  अपना काम कर रही थी हम चुपचाप मैडम के सामने बैठे थे ,, मन ही मन सोचने लगे थे की मैडम को भी नहीं आता होगा ,शायद मुकेश के जो भैया बॉम्बे मे पीएचडी कर रहे थे तो उन्होंने ने  पूछा होगा मुकेश से की प्रमोद इतना होशियार  हे तो ये सवाल पूछना फिर पता लगेगा मोहन लाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में केसी पढाई होती  हैं।   ढेर सारे विचार आ जा रहे थे।
हाँ क्या पूछ रहे थे मैडम ने पूछा हम ने फिर से सवाल दोहरा दिया। मैडम ने आराम से मुस्कुराते हुए जवाब दिया था बेटा  ये आर्गेनिक भी होता हैं और इनऑर्गेनिक भी होता हे,
  सभी मित्रों को हैप्पी हैप्पी ,,,आप सब खुश रहें और आपका प्रेम हमेशा अमर रहे ,,,,,,,जिसे भी प्रेम करे सिर्फ प्रेम करें। ..वस्तुओ की तरफ वक़्त के साथ न बदलें ,,,..क्योंकि आत्मा ,प्रेम और ऊर्जा एक समान  हे यह कभी नष्ट नहीं होती हैं , बस अपना रूप बदलती हैं ,

कोई पूछ रहा हैं मुझसे मेरी ज़िन्दगी की कीमत
मुझको याद आ रहा हैं, तेरा हल्के  से मुस्कुराना










Thursday, October 8, 2015

DARJEELING KA GOPU (ek sachhai ek prerna)-by Pramod Tiwari




दार्जिलिंग का गोपू -एक सच्ची कहानी-by Pramod Tiwari  

दार्जिलिंग का गोपू 

( एक  सच्चाई  एक प्रेरणा )

भईया गाडी रोकेंगे प्लीज !!! मैंने थोड़ा जोर लगाके कहा था क्योंकि मैं सबसे पीछे वाली सीट पर जो बैठा था. चाय खरीदनी हे हमें,मेरे अलफ़ाज़ पुरे ही नहीं हो पाये थे और कार सड़क से बायीं और रुक चुकी थी.हम सब कार से बाहर  आये और चाय की दुकानों की और बढ़ चले जैसे कोई होड़ लगी हो हम सब मुसाफिरों के बीच,होती भी कैसे नहीं दार्जिलिंग जो आये थे हमारे घर वालों को सबूत जो देने थे की हम वहां गए थे जहाँ हज़ारों चाय के बागान हे खूबसूरत वादियों  के बीच. मुझे  पता था हमारे साथ के कुछ लोग थोड़ी चाय खरीद चुके थे दार्जिलिंग के स्थानीय बाज़ार से और कुछ को अभी सबूत इकटठे करने थे,चाय के सबूत,बंगाल की चाहत और दार्जिलिंग का बयान सब कुछ तो घर ले जाना था हमे,   

एक ग्रीन एक दार्जिलिंग टाइप की चाय पत्ति के बैग खरदीकर ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे ओलिंपिक में मेराथन का स्वर्ण पदक जीतकर अपने देश का नाम रोशन कर दिया हो.चाय के पदक हाथों में लेते समय ही दुकानदार से पूछ लिया था की आस पास कोई नाश्ते की जगह हे और उत्तर पाकर धन्य भी हो गए थे, चायवाले ने बताया था थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा आगे एयरपोर्ट तक कोई नाश्ता हाउस नहीं हे,

गोपाल हमे नाश्ता करना हे थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा,गोपाल ने थोड़ा मुह बिचकाया और गाडी यू-टर्न करली, मैं आपको मेरी कहानी के हीरो का परिचय करवाना अपना मौलिक अधिकार समझते हुए कर्तव्य का पालन करना चाहता हूँ ,इस कहानी का हीरो हे गोपाल हमारी कार का ड्राइवर, बागडोगरा का निवासी हे और टूरिस्ट गाडी चलाता हे ,उम्र 24 वर्ष होगी ऐसा अंदाज़ा हे मेरा, हिम्मत नहीं कर पाये थे इतना निजी प्रश्न करने का गोपाल से, तो अंदाज़ा लगाना ही लाज़मी हे.हलके साँवले रंग का ठीक ठाक कद का, मान लेते हे इकीसवीं सदी का मिथुन या ऐसा कह देते हे मिथुन जैसा, 

सचिन जो की हमसफ़र थे इस यात्रा में उसे गोपू के नाम से पुकारने लगे थे,ये बात अलग थी की गोपाल कब हमारे लिए गोपू बन गया था ये गोपाल खुद नहीं जानता था क्योंकि हम उसके सामने गोपू शब्द जुबान पर कभी नहीं ला पाये थे ना  ही इतना साहस कर सके थे की उसे गोपू कह कर पुकारा जाये,हम नहीं चाहते थे की गोपू के साथ थोड़ा सा भी पर्सनल होना चाहिये, अगर हम होना भी चाहते तो शायद नहीं हो पाते गोपू था ही ऐसे स्वभाव का, चुपचाप और शांत।

तेज ब्रेक के साथ गाडी रोकी गोपू ने और अपनी नाराज़गी जाहिर कर रहा हो ऐसा लगा मुझे, उसकी मर्जी के क्षणिक विरोधी जो हो गए थे हम नाश्ते के लिए रूककर। क्या खाना हे, क्या अच्छा हे, कुछ हल्का, कुछ लंच जैसा, दो तीन मिनिट की कसमकश के बाद तय हुआ की चलो समोसा और चाय आर्डर की जाये। नाश्ते का आर्डर करके मेने अपनी जिम्मेदारी का का निर्वहन कर दिया हो ऐसा सोचकर इत्मीनान से आदेश की पालना का इंतज़ार करने लगा और इस साधारण से रेस्टोरेंट में बैठकर पिछले दो तीन दिन के सफर को ऐसे याद करने लगा जैसा कोई बहुत बड़ा साहित्यकार या शायर किसी कॉफी हाउस में बैठकर अपनी महत्वपूर्ण कृति का सृजन  करने में लीन हो ।

सिलिगिुरी,जलपाईगुड़ी,जंगल सफारी,मीटिंग,ट्रैनिंग,चाय के बागान, बारिश,झरने,मंदिर,पूर्वी भारतीय गोरखा और उनकी संस्कृती,टॉय ट्रैन, कंचनजङ्गा,मॉनेस्ट्री,लावा और नेशनल पार्क ,कालिम्पोंग की ख़ूबसूरत पर्वत माला ये सब तो चंद क्षणों में किसी पंछी की तरह मेरे मन मस्तिष्क से फुर्र से उड़ गए थे, बस ख्याल सारे के सारे गोपू पे आ टिके थे.आख़िर गोपू सारथी था हमारी इस यात्रा का।

सचिन ने हिदायत दी की कल सुबह 5 बजे निकल जायेंगे जलपाईगुड़ी से, हमारी गाडी आजायेगी पौने पांच बजे तक, मेरे मन में बेचैनी सी हुई ये सुनके मगर कोई रंग बदले बिना मेरे चेहरे का, मेने ठीक हे भाई कह कर सचिन की बात को समर्थन कर दिया था।  सुबह चार बजे उठकर में तैयार  हुआ और निर्धारित स्थान पर पहुँच गया जहाँ गाडी आने वाली थी,एक एक करके सभी साथी भी जमा होने लगे जो हमारे ग्रुप में थे और गाडी से दार्जिलिंग जाने वाले थे। चाय का प्याला अभी पूरा भरा ही नहीं था पीछे से सचिन की आवाज़ आयी -वो गाडी कैंसिल हो गयी, चाय का प्याला सँभालते हुए मेने सचिन को विडंबित लहज़े में पूछा ऐसा क्यों भाई, क्या पता यार ये ट्रेवल एजेंसी वाले ऐसा वैसा कुछ करते ही हे सचिन ने शालीनता से जवाब दिया। इसी समय हमारे ग्रुप के एक और सदस्य का आना हुआ और उनके सुझाव के अनुसार सचिन ने फिर से ट्रेवल एजेंसी को  फ़ोन किया जवाब मिला की जो ड्राइवर आने वाला था उसने मना कर दिया हे आख़री वक्त पर और अब नये ड्राइवर का इंतेजाम करके भेजते हे गाडी  एक घंटा  देरी हो जाएगी, सर माफ़ कीजिए ऐसा कह कर फ़ोन से रिस्ता तोड़ लिया था ट्रेवल एजेंसी वाले ने।    

गोपाल का नाम बताया कल मुझे ट्रेवल एजेन्सी वाले ने की आपको सुबह पांच बजे पिक करेगा सिंक्लेयर रिसोर्ट से अब गोपाल ने मना कर दिया,सचिन हमारे ग्रुप को जो जो हुआ उसके बारे में बता रहे थे ,ग्रुप  सदस्य ऐसे  देख रहे थे जैसे इस बेवजह हुई परेशानी में सचिन का ही हाथ हो, मै और सचिन तो जानते थे ये सब आम बात हे और हमे अनुभव भी थे ऐसी घटनाओ के तो हम ज्यादा विचलित हुए बिना नए ड्राइवर का इंतज़ार करने लगे और आस पास की हरियाली के साथ आपने आपको तस्वीरों में ढालने लगे कैमरा और फ़ोन के माध्यम से।

चलो गाडी आ गई हे सचिन ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, मेने जेब से फ़ोन निकल कर टाइम देखा 9 बजे थे,  मन ख़ुशी के मारे नाचने लगा था आख़िर अब हमे भी एक वाहन मिल गया था जिस पर सवार होकर हमे आगे की यात्रा करनी थी, ये ऐसा अवसर था जो हमारी योजना को मंज़िल तक पहुँचने में मददगार होने वाला था, सभी लोगों ने अपने अपने सामान अपलोड किये जैसे फेसबुक पर प्रोफाइल पिक्चर एडिट करके दुनिया को दिखाने के लिए बेसब्र हों.

मै ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा और सचिन सबसे पिछे वाली सीट पर, पुरे सफर में हम ही सीट्स बदलते रहे  थे एक दूसरे से क्योंकी हम ईश्वर से आशीर्वाद और प्रमाण पत्र लेकर जो आये थे की सबसे पिछे  हम दोनों में से कोई एक ही बैठेगा, कुछ लोगों ने अपनी क़िस्मत आजमाने का प्रयास भी किया था या यूँ कहूँ की हमारी सहायता करने की कोशिश की थी की वो भी सबसे पिछे वाली सीट पर बैठने का जज़्बा रखते हे, मगर ये जज़्बा कुछ ही पलों का रहा क्योंकि उन नाज़ुक और खूबसूरत लोगों का जी मचलने लगा था टेढ़े मेढे की रास्तों की वजह से, आखिर मेरे और सचिन को ही ये जिम्मेदारी निभानी पड़ी जो हम ऊपर वाले से प्रमाण पत्र में लिखवा कर लाए  थे।
भैया आपका नाम क्या हे मेने ड्राईवर से पूछा जवाब मिला गोपाल, मेरी कोतूहल  भरी निग़ाहें सचिन को देख रही थी और पूछ रही थी की ये कैसे जबकि गोपाल ने तो मना कर दिया था जैसा की हमे बताया गया था, सचिन ने  बिना लफ्जों के जवाब दिया था क्या पता, हो सकता हे या कुछ भी हमे क्या गाडी से काम जो था, हमारे ग्रुप को भी क्या फर्क पड़ता था की ड्राइवर का नाम क्या हे.

गोपाल गाडी थोड़ा तेज चला रहा था आमतौर पर पहाड़ों में लोग गाडी की स्पीड बहुत काम रखते हे, बारिश कहीं दिनों से हो रही थी और सामान्य जैसी नहीं तेज थी मौसम ख़ुश था चारों और बादल बादल थे, कभी कभी लगता था की गोपाल  कार नहीं हवाई जहाज़ चला रहा हो एक ऊँचे और उन्मुक्त आकाश में, अच्छा लग रहा था ऐसे  मौसम में सफर करना,  ढेरों अरमान जवान हो गए थे इस हसीन मौसम में, कुछ उड़ उड़ कर बाहर निकल कर तितलयां बन गए थे, कभी मैँ  गोपाल की ड्राइविंग देखता कभी पहाड़ों को, और रास्ते के  सैकड़ों मोडों को, मन में एक तसल्ली का भाव आ गया था की ये गोपाल गाडी अच्छे से चला रहा हे और उसकी ड्राइविंग पर बाकि साथियोँ ने भी सकारात्मक मुहर लगा दी थी,

जब भी हम कहते गोपाल गाडी रोक देता था पानी के लिए, कुछ खाना होता था, या वादियां देखनी होती थी और वो हमे हमारे हाल पे छोड़ देता था जितना चाओ रुको उसका कोई हस्तक्षेप नहीं होता था, न ही गोपाल के चेहरे के रंग बदलते थे, अक्सर ड्राइवर सलाहकार होते हे मगर गोपाल ऐसा कतही नहीं था,ग्रुप के कुछ साथियों को गोपाल का ऐसा बेरुखा व्यवहार पसंद नहीं आ रहा था, आमतौर पर गाडी चलाने वाले लोग वाचाल होते हे और ज्ञानी भी मगर ये हमारा सारथी चुप-चाप था और इसे किसी को लैक्चर भी नहीं देना था.

कल सुबह 4 बजे से पहले टाइगर हिल जाना हे ऐसा प्लान करके हम दार्जिलिंग की रात के सपनो में खोने की तैयारी करने में लग ही रहे थे की हमारे एक साथी ने पूछा उसका नाम वास्तव में गोपाल हे क्या? सवाल अच्छा था, सचिन ने तपाक से जवाब दिया हाँ शायद ओर ये भी हो सकता हे ऐसे ही बता रहा हो,सबका विचार फिर से प्रफ़ुलित हुआ नाम से क्या फर्क पड़ता हे, सच तो नहीं हे नाम से ही तो फर्क पड़ता हे, हमारे देश में तो  कम  से कम ।  जिसका  का नाम अंग्रेजों जैसा होता हे तो लोग कैसे उसको देवता की तरह आदर करते हे और जुबां से मातृ भाषा उड़न छू हो जाती हैँ और अंग्रेजी अपना सारा असर दिखाकर हवा की तरह फेल जाती हे चारों ओर. तो जनाब नाम और भाषा का बहुत फर्क हे दुनिया में,हाँ मगर हमारे साथ  हमसफ़र हे उनमे ज्यादातर मूलत: भारतीय प्रतित हो रहे थे।

सुबह उठ पायेगा गोपाल किसी ने फिर गोपाल पर सवालिया निशान छोड़ दिया था, फ़ोन कर देंगे उठा देंगे जवाब भी हाजिर था, ये समूह चर्चा करके हम सो गए दार्जिलिंग के साथ, टर्न टर्न की आवाज़ ने मुझे जगाया फ़ोन बज रहा था बिना ऑंखें खोले सचिन कह रहे थे हां उठ गए, मेने वक़्त देखा पौने चार बजे थे, तैयार होकर होटल की लॉबी में इकटठे थे  सब लोग. सचिन ने गोपाल को फ़ोन किया जवाब नहीं मिला, सचिन बोले गोपू फ़ोन नहीं उठा रहा, यही वह वक़्त था पहली बार जब गोपाल गोपू हो गया था हमारे लिए,इस नामांकरण पूरा श्रेय सचिन को जाता हे. 
सब  लोग पार्किंग की और चल पड़े जहाँ गोपू के होने की सम्भावना थी जैसे ही पार्किंग में पहुंचे गोपू तैयार था सब एक दूसरे को ऐसे  देख रहे थे जैसे कराची के मैदान पर सचिन तेंदुलकर की सेंचुरी की वजह से इंडिया टीम 100 रन्स से जीत गयी हो पाक टीम से, गोपू ने सही टाइम पर टाइगर हिल पहुंचा दिया था हमे, हवाएँ सर्द थी और  हमारे निचे बादल हम आसमान में हो ऐसा लग रहा था ,कई लोग आये थे यहाँ पर दार्जिलिंग का सबसे खूबसूरत नज़ारा देखने, मगर मौसम धुंधला था और सूरज को भी छुपा रखा था बादलों ने, कुछ नहीं दिखाई दे रहा था. हम भी  चिरपरिचित काम में सबकी तरह एक दूजे के फोटो लेने में व्यस्त हो गए । 

अचानक से बादलों को चीरते हूए हलकी सी रौशनी आने लगी,भी कॉफ़ी के कप के साथ उस और देखा जहाँ सब लोग देख रहे थे ,कांचनजङ्गा की ओर, देखो देखो वो रही थोड़ा सा झांक रही थी ये दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत माला हिमालय की चोटी। हम भी बाकि लोगों की तरह धन्य हो गए थे इस नज़ारे को  दिमाग़ और कैमरा में कैद कर के. वाक़ई बहुत खूब नज़ारा था,अमिट रहने वाला हमेशा के लिए,

फिर हम चल पड़े टॉय ट्रेन  लिए और वहां से कालिम्पोंग की ओर, लावा घूमे कहीं जगह घूमे, एक से बढ़कर एक हसीन पहाड़ियां  उन पर इठलाते पेड़ पौधे ,सुन्दर खिलखिलाते फूल ,रंगों से सरोबार, मदमस्त बहते झरने ,एक अंकल और उनकी चाहत लावा में,क्या कैसे कहूँ अल्फ़ाज़ ही नहीं बयां हो पा  रहे इतनी खूबसूरती के लिए, वास्तव में बहुत प्यारा हे हमारा भारत ,क्या नहीं हे सब तो हे इस ज़मीं पर.   

गोपू ने कब खाना खाया कब चाय पी , कब सोया ,कब उठा, हमे कुछ पता नहीं चलने दिया, बस उसे तो हमे हमारी मंज़िल तक पहुँचाना था ऐसा लगता था, थोड़ा दीवानो जैसा था गोपू, जैसे किसी को बहुत प्यार करता हो और हर वक़्त अपने महबूब को खोजता रहता हो, मगर ईमानदार, कभी कोई जरुरत नहीं पेश की थी उसने हमारे सामने,  कभी  नहीं वक़्त माँगा चाय पिने या खाने के लिए, शायद गोपू को भी हमारा ग्रुप पसन्द आ गया  होगा, यक़ीन से नहीं कह सकते, पर हाँ इस बात का पक्का यकीन हे गोपू आपने काम को लेकर बहुत समर्पित था, समझदार भी था. वास्तव में गोपू परिवर्तन के साथ गतिमय था. वो आधुनिक भी था कोई मलाई मक्खन की  बातें नहीं जैसे अक्सर ड्राइवर करते हे, ना ही परंपरागत वाहन चालक, न ही अपनी मर्जी थोपी उसने कभी, की वहाँ गाडी नहीं जाती, यहाँ रुकना मना हे,अलग तो था ही गोपू क्योंकि मेने मेरे जीवन यात्रायें की हे पूरा भारत घूमा हूँ अपने रिसर्च के काम के लिए और तरह तरह के लोग मिले उनका व्यहवार देखा, महसूस किया लेकिन गोपू आम ड्राइवर नहीं था, न  कोई विदेशी था जो ऐसे प्रोफेशनल हो, गोपू तो साधारण भारतीय था जो अपने काम को कैसे और कितने अच्छे से कर सकता था उसको पता था उम्र का अनुभव नहीं होने के बावजूद भी.
गोपू की नज़र में महिलाएं और पुरुष समान थे ऐसा मै कह सकता हूँ क्योंकि वो सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता था, जैसा की आमतौर पर देखने को नहीं मिलता हे हमारे रूढ़िवादी समाज में,मैने मेरे जीवन में सौ से भी ज्यादा रिसर्च प्रोजेक्ट में काम किया हे और कई देसी-विदेशी लोग जुड़े रहे उनको करीब से देखा उनकी कार्य क्षमता और उनका समर्पण काम के लिए, मगर बहुत कम  ही देख पाया जो सिर्फ दिए गए टास्क कर काबिज़ रहे हो,

भाई कुछ और आर्डर करना हे ? सचिन की आवाज़ ने झंझोरा मुझे और एक ही पलांश में गोपू  के ख्यालों से बाहर खींच लाई थी।  मेने कब मेरा नाश्ता खत्म किया पता ही नहीं चला, मेने न के संकेत में दर्दन हिला दी और कैश काउंटर की और चल दिया पेमेन्ट करने के लिए, और आख़िरी बार  गोपू सारथी की  रथ रूपी कार में सवार होने, दो मिनिट्स में एयरपोर्ट आ गया, गोपू ने डिक्की का दरवाजा खोल दिया था हमने सामान लिए और ट्रॉली पर चढ़ा दिए। सचिन ने मुझे फाइनल पेमेन्ट करने से पहले नोट गिनने को दिए मेने पुरे हे ऐसा कहकर गोपू को थमा दिए थे।
हम सबने गोपू को शुक्रिया अदा किया अंग्रेजी में कहा थैंक यू , गोपू ने गर्दन हिला कर स्वागत किया और अपनी कार की ओर बढ़ गया, उसे पता जो था हम तो क्षणिक हे उसका काम ही हे जो उसे हमेशा आबाद रखने वाला हे, में देखता रहा गोपू को जब तक उसकी कार आँखों से ओझल नहीं हो गई।     

कितना कुछ सीखा गया था गोपू हमे इन तीन दिनों में जिसे सिखने में लोग सदियाँ लगा देते हे.   धन्यवाद गोपू

       


  

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Wednesday, August 19, 2015

Welcome Friends Fir se Do boond muskan ke liye....


चाँद आने को हे फ़लक पे,हो ना जाये सहर तेरे आने तक। 







Monday, February 3, 2014

ताजमहल

Visit to TAJ-hazaron desi-videsi logon ke saath hum bhi Taj darshan ke liye ek lambi si que ko par karke pahunche,,achha laga aaj Taj dekhna magar kuch missing tha shayad yesa laga mujhe,haan mere saathi log (Jitendra ji and Avinash) khush the..socha unhi ki khushi ke kahtir fir se ek lambi line me lag gaye the..TAJ ko dekhne me,,ek ke pichhe ek ho liye.jese kisi Rashan shop me chinni lene ja rahe ho ya bahut bade mandir me darshan ki formality karne ke liye khade ho..kuch dhakke khaye kabhi left me kabhi right me,aur security ke aawazen aage badho.chalte raho...hum bhi chalte gaye,,andar sukun hi nahi tha...sab log alag alag andaz me photo le rahe the,vahan bhi ek ajeeb hod lagi thi TAJ ko camera me qaid karne ki,,yesa lag raha tha jese log aaj TAJ ko ghar le jayenge..hazaron ki bheed,,aur me Tanha sa,,mene bhi photo liye..par un jagah ke jahan bheed nahi thi..
Achanak meri nazar ek Gilhari pe gayi--arey kitni masti ke saath fudak rahi thi,in pyare phoolon ke asspass.us taraf ek safed panchhi bhi tha(white bagula) wo bhi to badi style me idher udhar ghum raha tha..masti me..use kya lena dena tha logon se aur Tajmahal se use to masti karni thi..me bhi kuch pal unke saath raha..sach me unki masti TAJ se jyada thi...Do boond muskan jo de gayi thi mujhe..........

Wednesday, January 29, 2014

Field visit to sagar





Field visit ke samay jab hum photos le rahe the ek bank kiosk center par, vahi ek 8 saal ki bachhi hume dekh rahi thi uske papa ke saath.wo daudi daudi gayi aur ek bada sa camera leke aayi.ab hum sab log use dekh rahe the aur muskura rahe the wu kitne perfection ke saath click kar rahi thi......uske papa bade garv se uski tarifen kar rahe the,,unki do boond muskan.......hamari muskan ka saath de rahi thi......

Monday, January 27, 2014

उदयपुर





 Lake Pichhola -Udaipur 
जब हवा चलती हे तब  पानी में लहरें होती हे, मेरे मन को और दे जाती हे दो बूँद मुस्कान।।।।।।।।।।।।।।।